Popular Posts

Monday, March 15, 2010

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के अगुवा

इस पथ का उद्देश्य नहीं शांत भवन में टिक कर रहना....
किन्तु जाना उस सीमा तक ....जिसके आगे कोई राह नहीं....
आँखों की बूंदों का आशय नहीं...अंतर्मन की पीड़ा सहना...
किन्तु पाना उस चीत्कार को..जिसके आगे ..कोई आह नहीं...
सूनेपन का निर्णय नहीं.. सर्वत्र मौन ही रहना...
किन्तु अर्जित वो ध्वनि करना... सीमाओ की जिसे परवाह नहीं...
सुखद स्वप्नों का लक्ष्य नहीं...त्रष्णाओ की पूर्ति होना...
किन्तु पाना उस आनंद (प्रभु) को.....पश्चात जिसके...कोई चाह नहीं...
......................................................
है यदि जीवन एक युद्ध भूमि ... तो एक युद्ध और सही .

No comments: